PARMATMA EK- परमात्मा एक उपदेश |
PARMATMA EK- परमात्मा एक उपदेश |
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| PARMATMA EK- परमात्मा एक उपदेश | |
महानत्यागी बाबा जुमदेवजींनी परमेश्वरप्राप्तीनंतर भगवंताच्या आदेशाप्रमाणे नवीन मानवधर्माची सुरुवात केली. या धर्माचा मुख्य उद्देश हाच होता की, प्रत्येक नरनारीमध्ये भगवंताचा वास आहे. तो आत्मा आहे आणि आत्मा २४ तास चैतन्य आहे. कारण त्यात दैवीशक्ती ही जागृत आहे. मानवांना उद्देशुन बाबा सांगतात की, सजीवांमध्ये भगवान आहे. निर्जीव वस्तुत तो नाही. म्हणून ते मानवाला जीवनात केलेली निर्जीव मुर्तीची पुजा बंद करायला सांगतात. कारण मानव अनेक दैवत मानत असल्यामुळे त्याचा मानसिक परिणाम नरनारी या दोघांवरही आहे. त्याचा दुष्परिणाम त्या कुटुंबावर होतो. या गोष्टींचा लाभ ज्योतिषी, तांत्रिक, मांत्रिक हे लोक जास्त प्रमाणात घेतात. परमेश्वराने महानत्यागी बाबा जुमदेवजी कडून वचन घेतले आणि बाबांनी ते भगवंताला दिले.
जीवनात परमेश्वरी सेवेमध्ये इमानाने निष्काम सेवा करीन. त्याप्रमाणे बाबा गेल्या ४६ वर्षांपासून निष्काम भावनेने मानव जागृती करतात. बाबा एक गृहस्थ असूनही त्यागी आहेत. ते गुरुपुजा घेत नाहीत. तसेच कोणत्याही प्रकारची दक्षिणा दान घेत नाहीत. त्यांचा उद्देश एकच आहे. भगवान नरनारीमध्ये विराजमान आहे. म्हणून बाबा इमान समोर ठेवून निष्काम भावनेने नरनारी यांना मार्गदर्शन करतात व त्यांच्या जीवनातील दुःख दुर करतात. बाबा त्यात हस्तक्षेप करीत नाहीत.
बाबांच्या मार्गदर्शनाने या धर्मात प्रवेश केलेले लोक स्वतः हवन करतात. महान लोकांनी लिहिल्याप्रमाणे 'आपली सोडवणूक करावी आपणच' या उक्तीप्रमाणे ते वागतात. स्वतःची सोडवणूक स्वतः करतात आणि त्यांच्याकडे येणाऱ्या दुःखी लोकांना मार्गदर्शन करुन ते त्यांचे पण दुःख ते दुर करतात. सापाचे जहर उतरवितात. या धर्माची बाई असो की पुरुष असो त्याचे आत्मशक्तीबल त्याच्या सद्भावनेला वाढलेले आहे. ही प्रचिती या धर्माच्या प्रत्येक सेवकाला (नरनारीला) आहे. आत्मानुभव हीच सत्य आत्मप्रचिती व हेच सत्य आत्मज्ञान हे या धर्मात सिध्द झालेले आहे. या देशात प्रत्येक धर्मात लोक अंधकारमय जीवन कसे जगतील, त्याचा लाभ आपल्या धर्माला कसा मिळेल हा त्यामागील उद्देश असावा असे बाबा समजतात. म्हणून ही दैवीशक्ती या धर्मात सत्य जागृत झाली आहे. या दैवी शक्तीचे चार तत्व, तीन शब्द, पाच नियम या बंधनाने मानवाला वाईट विचारांतुन मुक्त केले व वाईट विचारांचा नाश केला. आज देशाला या नियमांची अत्यंत आवश्यकता आहे.
दि. ११/१२/१९७१-
बाबा बोलता वह भगवान बोलता। भगवान बोलता वह बाबा बोलता है बाबाने दिये हुये नियम को जागना भगवान को जागना है।
दि. २५/०३/१९७२-
सरपंच साधते हुये परमार्थ करे, भगवत् कृपा पाए जीवन सफल बनाये जबतक मानव को परिपूर्ण समाधान मिलता नही तब तक मानव मंदिर सजता नहीं। बाबा के आदेश से काम करने से बहुत बडा लाभ होता है। बाबा के बैठक में आत्मा के विचार को साफ रखना चाहिये।
दि. २२/०७/१९७२-
भगवान का कार्य भगवान करेगा, लेकीन मानव का कार्य मानव ने ही करना चाहिये मानव अपने जीवन में एकता की भावना बिना भगवत् कृपा पा नहीं सकता।
इस मार्ग पर जो भी पिडीत और गरीब है असे सहकार्य करना चाहिये। बाबा अपने आपसे,
नीति से अनीती पहनायेगा तो उसे भगवान नष्ट कर देगा। इसलिये मानवता को पहचाने
और हमारी मानवता को कोई धक्का न दे। हमारी मानवता को न ललकारे।
दि.०१/०९/१९८०-
३३ वे प्रगट दिन के उपलक्ष में निष्काम कर्मयोग व्दारा भगवत प्राप्ती के लिये मानव धर्म का मार्गदर्शन करने वाले महानत्यागी बाबा जुर्देवजी का इस देश के नागरिको कों संदेश
इस देश का नागरिक सत्य के लिये जाग जाये। युग परिवर्तन हो रहा है।
सत्ययुग, द्वापर युग, त्रेता युग और कलियुग के बाद घुमकर सत्ययुग आ रहा है। इस युग परिवर्तन के आनेवाले प्रलय से जो मानव सत्यकर्म करेगा। वही बच पायेगा इसलिये इस देश के नागरिक अपने जीवन में सत्य, मर्यादा और प्रेमका पालन करके मानव जीवन सफल बनावे। हाल की परिस्थिती में हो रहा भ्रष्टाचार दूर करना यह कोई भी मानव के हाथ की बात नहीं है। उसे भगवत् कृपा ही दूर कर सकती है। युग परिवर्तन के चक्र से निर्माण होने वाले प्रलय से मानव को खुद सुरक्षित रहना है तो हर मानव ने अपने जिवन में सत्य, मर्यादा और प्रेम का आचरण करना चाहिये। और भगवान को शांती प्रदान करनी चाहिये। यही बाबाने नागरिको को संदेश दिया।
दि.२०/०८/१९८१-
चौतीसवे प्रगट दिन के उपलक्ष में सत्य ही परमेश्वर है। और परमेश्वर ही सत्य है। पृथ्वी पर मानव यही
एकमेव प्राणी है, जो इस श्रेय को समझ सकता है। इसलिये मानवता के नाम बाबा का यही संदेश है की, हे मानव तु जाग जा, तुफान आनेवाला है। जो जागेगा सो पायेगा। जो सोयेगा सो खोयेगा। सत्य, मर्यादा, प्रेम यही जीवन की सफलता है। सत्य, मर्यादा, प्रेम को अपनाने वाला मानव ही भगवान को पायेगा।
दि.१७/०८/१९८४-
सदतिसाव्या प्रगट दिनानिमित्य संदेश:-
इस मार्ग पर दिये गये चार तत्व, तीन शब्द और पाच नियम का सेवक पालन करते है।
उसी प्रकार उनके बच्चो का ठीक ढंग से पालन पोषण होना चाहिये और उन्हें अच्छी शिक्षा मिले इसलिये हर परिवार ने अपने कुटुंब में नियोजन करना चाहिये।
बाबा का आदेश है। इसलिये उन्हें निचे दिये हुये नियमों का बंधन पालना चाहिये।
यह
१) इस मार्ग पर जो सेवक है, या होंगे, उस परिवार से जिनकी शादी तय हुई है या होगी उन्होने अपना परिवार दो या तीन बच्चे तकही सिमित रखना चाहिये।
२) महिलाओं ने वैद्यकीस सलाह लेकर गर्भप्रतिबंधक उपाय करना चाहिये।
३) हर परिवार में लड़कों की शादी की उम्र की मर्यादा २५ साल होगी। २५ साल से कम उम्र के लडके शादी न करे।
उपर बताये हुये नियमों का हर परिवार ने पालन किया तो उन्हे लाभ होगा। और उससे शरीर स्वास्थ ठीक रहेगा। पैसे की बचत होगी और उसकी जिंदगी उभर आयेगी। देश की एकता, एकात्मता और अखंडता टिकाना हर मानव का कर्तव्य है।
महानत्यागी बाबा जुमदेवजी नागपूरच्या आठही गटांत सप्टेंबर १९९० मध्ये चर्चा बैठक झाली असता प्रत्यक्षपणे हजर होते. त्यावेळी त्यांनी दिलेला संदेश.
दि. २३/०९/१९९०-
गट नं.२, खापरी मोहल्ला-
देश में गंदा राजकारण है। गरीबों का जानलेवा राजकारण है। लोगों का खून पीने के लिये पुंजीपतीयों के हाथ में देश है लोकशाही बेईमानी के लिये आयी है। संगदिल बनाओ। लोगों को हरामखोर मत बनाओ। कर्ज माफ करना हरमाखोर के लक्षण है। इसलिये बाबा जगाने आये है। आप सेवक जागो। खुद कष्ट करो और देश को बचाओ।
दि. २७/०९/१९९०
गट नं. ४, नवी मंगळवारी-
संसार को बदलने वाला एक ही शब्द है। वैचारीक क्रांती। जिसकी आज नितांत
गरज है। धरती एक, भगवान एक, विचार अनेक। तरने के लिये लीनता चाहिये और हुबने के लिये अभिमान होना। इस मार्ग का सच्चा उद्देश "आपली सोडवणुक करावी आपणच" दैवी शक्ती को पहचानना प्रत्येक का कर्तव्य है। अज्ञानी मानवने बाबा मेरे पास है कहने से वैचारिक क्रांती नही होगी।
दि. २८/०९/१९९०
गट नं. ३, लालगंज -
भगवान को कलियुग परिवर्तन करना है। सत्य का उगम करना है। नर नारी को जगाना धर्म है। झूठ का प्रायश्चित करना है। इस मार्ग को बाई सती रेणुका से कम नही। भगवान बुद्ध का विधाता है। दैवी शक्ती सबसे बड़ी शक्ती है हमें सत्कार्य करना है
परिवार और सेवकों में।
दि. ३०/०९/१९९० गट नं.
१ आणि ५ भवनात -
मानव लाख चतुराई करेगा। पर मानव को सत्य के लिसे जागना होगा। वैचारिक क्रांती का मार्ग है। अविचारी लाभ उठा रहे है इसलिये दैवी शक्ती का उगम हुआ है। इस मार्ग में सेवक, सेवकों को गलती से छुडाता है। दैवी शक्ती है, वहाँ दया, क्षमा, शांती है।
कर्म का फल उसी को प्राप्त होता है।
दि. ०४/१२/१९९० धूप या गावी
दि. १६/०२/१९९१
सेवक सम्मेलन, रामटेक
इस मार्ग पर जो दैवी शक्ती प्राप्त हुई है वह हमेशा के लिये जागृत है वह आत्मा को चैतन्यमय बनाती है। इसलिये इस मार्ग पर आनेवाले लोगों के कष्ट, दुःख एक पल में नष्ट होते है। सत्य, मर्यादा, प्रेम से चलना यही इस मार्ग का उद्देश है।
दि. २४/०२/१९९१
सेवक सम्मेलन, रामटेक
इस मार्ग पर आनेवाला कोई दुःखी, कष्टी सेवक उनसे छुटकारा पाकर वह उसके बाद अपनी जिंदगी में कभी भी दुःखी, कष्टी नही हो सकता। और गरीब नही रह सकता। यह बाबा का दावा है। लेकीन बाबाने दिये हुये तत्व, शब्द और नियम का पालन करना चाहिये और बाबा का शब्द भगवान के शब्द समझकर उस पर अमल करना चाहिये।
भगवान बाबा हनुमान जी की जय। महानत्यागी बाबा जुमदेवजी की जय।
परमात्मा एक सत्य, मर्यादा, प्रेम कायम करनेवाले,
अनेक वाईट व्यसन बंद करनेवाले, मानव धर्म की जय।
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